Vishwakarma Ji Ki Aarti: बिना आरती अधूरी है भगवान विश्वकर्मा की पूजा, स्पेशल आरती यहां पढ़िए-सुनिए

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Vishwakarma Puja 2020, Puja Vidhi, Muhurat, Mantra: आज देशभर में विश्वकर्मा पूजा मनाई जा रही है। कुछ ज्योतिषाचार्यो के अनुसार भगवान विश्वकर्मा जी का जन्म आश्विन कृष्णपक्ष का प्रतिपदा तिथि को हुआ था। वहीं कुछ का मनाना है कि भाद्रपद की अंतिम तिथि भगवान विश्वकर्मा की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। पौराणिक काल में देवताओं के अस्त्र-शस्त्र और महलों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था। भगवान विश्वकर्मा को निर्माण और सृजन का देवता माना जाता है। भगवान विश्वकर्मा ने सोने की लंका, पुष्पक विमान, इंद्र का व्रज, भगवान शिव का त्रिशूल, पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ नगर और भगवान कृष्ण की नगरी द्वारिका को बनाया था।

वहीं मान्यता है कि हर साल अगर आप घर में रखे हुए लोहे और मशीनों की पूजा करते हैं तो वो जल्दी खराब नहीं होते हैं। मशीनें अच्छी चलती हैं क्योंकि भगवान उनपर अपनी कृपा बनाकर रखते हैं. भारत के कई हिस्सों में हिस्से में बेहद धूम धाम से मनाया जाता है। विश्वकर्मा पूजा के दिन राहुकाल दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से 01 बजकर 53 मिनट तक है। इस समय काल में पूजा न करें।

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17 सितम्बर दिन गुरुवार का शुभ मुहूर्त

शुद्ध आश्विन कृष्ण्पक्ष अमावश्या शाम 04 बजकर 15 मिनट के उपरांत प्रतिपदा
श्री शुभ संवत -2077,शाके -1942,हिजरीसन -1442-43,

सूर्योदय -05:55
सूर्यस्य -06:05

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सूर्योदय कालीन नक्षत्र -पूर्वाफल्गुन उपरांत उत्तराफाल्गुन, शुभ- योग, च -करण

सूर्योदय कालीन ग्रह विचार -सूर्य-सिंह, चंद्रमा-सिंह, मंगल-मीन, बुध-कन्या, गुरु-धनु, शुक्र-कर्क, शनि-धनु, राहु-मिथुन केतु-धनु

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भगवान विश्वकर्मा की पूजा का मंत्र
ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:, ॐ अनन्तम नम:, ॐ पृथिव्यै नम:

भगवान विश्वकर्मा की आरती (vishwakarma puja aarti bhajan)

ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥1॥
आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
शिल्प शस्त्र का जग में, ज्ञान विकास किया ॥2॥
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥3॥
रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना॥4॥
जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी॥5॥
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे॥6॥
ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे।
मन दुविधा मिट जावे, अटल शांति पावे॥7॥
श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥8॥

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