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अमित शाह अपने आप में एक देश बन गए हैं जिन पर कोरोना के क़ानून लागू नहीं होतेः रवीश कुमार

क्या चुनाव आयोग अमित शाह पर कार्रवाई कर सकता है? इस सवाल को पूछ कर देखिए। आपको महसूस होगा कि आप खुद से कितना संघर्ष…

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रवीश कुमार/ अमिता शाह।

पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। ठीक इसी समय कोरोना की दूसरी लहर देश के कई राज्यों मे कहर बरपा रही है। इन मुश्किल हालातों से निपटने के लिए राज्य सरकार सहित चुनाव आयोग ने कई सख्त नियम लागू किए हैं हालांकि उनका पालन नहीं हो पा रहा है। नेता और केंद्र सरकार के कई मंत्री बिना मास्क धुंआधार रैलियां कर रहे हैं जिनमें गृहमंत्री अमित शाह भी शामिल हैं। एक तरह जनता से जहां कोरोना नियम पालन नहीं करने को लेकर उनपर लाठियां बरसाईं जा रही हैं वहीं नेताओं के रैलियां करने पर चुनाव आयोग चुप्पी मारकर बैठ गया है। इसी को लेकर एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने ये लेख लिखा है-

क्या चुनाव आयोग अमित शाह पर कार्रवाई कर सकता है? इस सवाल को पूछ कर देखिए। आपको महसूस होगा कि आप खुद से कितना संघर्ष कर रहे हैं। ख़ुद को दांव पर लगा रहा है। अमित शाह पर कार्रवाई की बात आप कल्पना में भी नहीं सोच सकते और यह तो बिल्कुल नहीं कि चुनाव आयोग कार्रवाई करने का साहस दिखाएगा। क्योंकि अब आप यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि चुनाव आयोग की वैसी हैसियत नहीं रही। आप जानते हैं कि कोई हिम्मत नहीं कर पाएगा।

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चुनाव आयोग ने ही नियम बनाया है कि कोरोना के काल में रोड शो किस तरह होगा। उन नियमों का गृहमंत्री के रोड शो में पालन नहीं होता है। रोड शो में अमित शाह मास्क नहीं लगाते हैं। बुधवार को दिन भर बिना मास्क के रोड शो करते रहे। जब आयोग गृह मंत्री पर ही एक्शन नहीं ले सकता तो वह विपक्षी नेताओं के रोड शो पर कैसे एक्शन लेगा ? लेकिन अमित शाह आयोग के नियमों का पालन करते तो आयोग विपक्षी दलों की रैलियों में ज़रूर एक्शन लेता कि कोविड के नियमों का पालन नहीं हो रहा है।

चुनाव आयोग हर दिन अपनी विश्वसनीयता को गँवा रहा है ताकि उसकी छवि ख़त्म हो जाए और वह भी गोदी मीडिया के एंकरों की तरह डमरू बजाने के लिए आज़ाद हो जाए। हर तरह के संकोच से मुक्त हो जाए।

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तालाबंदी और कर्फ्यू की विश्वसनीयता ख़त्म हो चुकी है। पहली बार जनता को लगा था कि अगर बचने के लिए यही कड़ा फ़ैसला है तो सहयोग करते हैं। इस मामले में जनता के सहयोग करने का प्रदर्शन शानदार रहा। हालाँकि उसे पता नहीं था कि तालाबंदी का ही फ़ैसला क्यों किया गया? क्या यही एकमात्र विकल्प था? हम आज तक नहीं जानते कि वो कौन सी प्रक्रियाएँ थीं ? अधिकारियों और विशेषज्ञों ने क्या कहा था? कितने लोग पक्ष में थे? कड़े निर्णय लेने की एक सनक होती है। इससे छवि तो बन जाती है लेकिन लोगों का जीवन तबाह हो जाता है। वही हुआ। लोग सड़क पर आ गए। व्यापार चौपट हो गया।

फिर जनता ने देखा कि नेता किस तरह लापरवाह हैं। चुनावों में मौज ले रहे हैं। बेशुमार पैसे खर्च हो रहे हैं। लगता ही नहीं कि इस देश की अर्थव्यवस्था टूट गई है। रैलियों में लाखों लोग आ रहे हैं। रोड शो हो रहा है। यहाँ कोरोना की बंदिश नहीं है। लेकिन स्कूल नहीं खुलेगा। कालेज नहीं खुलेगा। दुकानों बंद रहेंगी। लोगों का जीवन बर्बाद होने लगा और नेता भीड़ का प्रदर्शन करने लगे। यही कारण है कि जनता अब और कालाबाज़ारी झेलने के लिए तैयार नहीं है। पिछली बार जब केस बढ़ने लगे तो प्रधानमंत्री टी वी पर आए। गँभीरता का लबादा ओढ़े हुए। आज हालत पहले से ख़राब है वे चुनाव में हैं। उनके गृहमंत्री बिना मास्क के प्रचार कर रहे हैं। उनके रोड शो में कोई नियम क़ानून नहीं है। वहीं जनता पर कोरोना के नियम क़ानून थोपे जा रहे हैं। अमित शाह अपने आप में एक अलग देश बन गए हैं जिन पर भारत के कोरोना के क़ानून लागू नहीं होते हैं।

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लेख साभारः https://www.facebook.com/RavishKaPage

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