मोदी Vs नेहरू काल में महामारी और जन स्वास्थ्य के हाल और देशज चिकित्सा पद्धतियां | ख़बर खर्ची

मोदी Vs नेहरू काल में महामारी और जन स्वास्थ्य के हाल और देशज चिकित्सा पद्धतियां

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इतिहास में नजर डालें तो नेहरू (jawaharlal nehru) की बहुत सारी कमियां आपके सामने नजर आ सकती हैं लेकिन उनकी उपलब्धियों को नकार भी नहीं सकते हैं। जब मौजूदा हालात में देश कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है और देश की अर्थव्यस्था रसातल में पहुंच चुकी है ऐसे में नेहरू काल के स्वास्थ्य सेवाओं की भी चर्चा जोरों पर है। बहुत से लोग ये जनाना चाहते हैं कि नेहरू काल में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल था?

केंद्र में मौजूदा मोदी सरकार किसी ना किसा बहाने नेहरू की कार्यनीतियों का हवाला देते हुए ना सिर्फ विपक्ष को आड़े हाथों लेती है बल्कि देश के सामने मोदी बरक्स नेहरू की बहस को भी खड़ा कर देती है।

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बता दें नेहरू ने अपने कार्यकाल में भारत की देशज चिकित्सा पद्धतियों मसलन, आयुर्वेद, यूनानी आदि को वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बनाने और उनके आधुनिकीकरण पर भी ज़ोर दिया। जून 1956 में बंबई में चिकित्सकों और शल्य-चिकित्सकों की सभा को सम्बोधित करते हुए नेहरू ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के अनुरूप देशज चिकित्सा पद्धतियों में सार्थक बदलाव लाने की ज़रूरत है। इसके लिए नेहरू ने वैज्ञानिक प्रयोग और अनुसंधान से प्राप्त होने वाले नतीजों पर ही भरोसा करने की बात कही।

नेहरू ने यह भी कहा कि अक्सर लोग आधुनिक चिकित्सा पद्धति को ‘पश्चिमी चिकित्सा पद्धति’ कह देते हैं, जोकि गलत है। क्योंकि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भारत, अरब और ग्रीक की चिकित्सा पद्धतियों और उनकी ज्ञान-परम्परा का भी समावेश हुआ है।

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यहां गौरतलब बात है कि साल 1956 में नयी दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की स्थापना में नेहरू की बड़ी भूमिका रही। नेहरू के प्रधानमन्त्री रहते हुए ही पुणे में राष्ट्रीय विषाणुविज्ञान संस्थान (1952), बेंगलुरु में राष्ट्रीय क्षयरोग संस्थान (1959) और दिल्ली में मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज (1959) और गोविंद वल्लभ पंत हॉस्पिटल की स्थापना हुई। वहीं साल 1958 में देशज चिकित्सा पद्धतियों के पुनरुत्थान हेतु प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. केएन उडुप्पा की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की गयी थी।

समिति ने देशज चिकित्सा पद्धति के विकास और उसकी उच्च शिक्षा व शोध सम्बन्धी अपनी रिपोर्ट अप्रैल 1959 में भारत सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में दिए गये सुझावों और परामर्श ने भारत में आयुर्वेद व अन्य देशज चिकित्सा पद्धतियों के आधुनिकीकरण, शोध व विस्तार में अहम भूमिका निभाई।

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गौरतलब बात है कि नेहरू की अध्यक्षता में राष्ट्रीय योजना समिति के अन्तर्गत 29 उप समितियों का गठन किया गया था। इन उप समितियों की रिपोर्टों ने स्वतंत्र भारत के विकास और पुनर्निर्माण की योजना का खाका तैयार करने में अहम भूमिका अदा की। इसमें एक उप-समिति राष्ट्रीय स्वास्थ्य से भी जुड़ी थी। जिसके अध्यक्ष कर्नल साहिब सिंह सोखी और डॉ. जेएस नेरुरकर थे।

स्वास्थ्य समिति ने अपनी रिपोर्ट में गरीबी, बीमारी और अक्षमता के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के निर्माण, हरेक भारतीय को समुचित चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराने का सुझाव दिया था। शिशुओं और मातृत्व की उचित देखभाल की वकालत करने के साथ ही समिति ने स्वास्थ्य को हरेक व्यक्ति के बुनियादी अधिकार के रूप में पारिभाषित किया। इतिहासकार सुनील अमृत ने उक्त स्वास्थ्य समिति की रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि यह रिपोर्ट ब्रिटिश भारत में स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे पर औपनिवेशिक दृष्टि की सीमाओं से परे जाकर सोचने का अनूठा उदाहरण पेश करती है। इस रिपोर्ट की ख़ास बात ये भी थी कि इसमें भारत की विविधता को किसी समस्या के रूप में नहीं बल्कि भारत की शक्ति के रूप में देखा गया। तो नेहरू का विजन स्वास्थ्य को लेकर काफी बड़ा था।

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