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5वीं से भी कम पढ़े MDH के धर्मपाल ने कैसे खड़ी की 1500 करोड़ की कंपनी

महाशय धर्मपाल गुलाटी का जन्म साल 1923 में महाशय चुन्नीलाल गुलाटी और चन्नन देवी के घर सियालकोट में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है।

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महाशय धर्मपाल गुलाटी का जन्म साल 1923 में महाशय चुन्नीलाल गुलाटी और चन्नन देवी के घर सियालकोट में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है।

बात उन दिनों की है जब देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था। यानी सन 1947। आजादी के बाद देश का जब विभाजन हुआ। इसी वक्त एक परिवार पाकिस्तान छोड़ दिल्ली चला आया और फिर दिल्ली में ही गुजर बसर के लिए एक तांगा चलाने लगा। ये परिवार कोई और नहीं बल्कि देश के दौलतमंद लोगों में शुमार हो चुके मसलों के किंग महाशय धर्मपाल के परिवार की है। धर्मपाल का 3 दिसंबर सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया है।

धर्मपाल भी अपने पिता की तरह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तक और करोल बाग़ से बाड़ा हिंदू राव तक तांगा चलाने लगे। वहीं धर्मपाल के पिता करोल बाग़ में ‘महशियान दी हट्टी’ के नाम से अपना पुराना मसालों का कारोबार शुरू किया। वो सूखे मसाले खरीद कर उन्हें पीस कर बाज़ार में बेचते थे।

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दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर तांगा चलाकर दो आना प्रति सवारी कमाने वाला एक शख्स बाद के दिनों में अरबपति बन गया। धर्मपाल ने MDH मसाले से देश ही नहीं विदेशों तक में अपनी पहचान बनाई

गौरतलब है कि धर्मपाल ने स्कूल की पढ़ाई तो शुरू की लेकिन पांचवीं का इम्तिहान वो नहीं दे पाए। साल 1933 में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और अपने पिता की मदद से नया कारोबार शुरू करने की कोशिश करने लगे। खुद अपनी आत्मकथा में धर्मपाल ने इस बात का खुलासा किया है कि उन्होंने ‘पौने पांच क्लास तक की’ ही पढ़ाई की है।

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धर्मपाल ने पहले पिता की मदद से आईनों की दुकान खोली, फिर साबुन और फिर चावल का कारोबार किया। लेकिन इन कामों में मन नहीं लगने पर बाद में वो अपने पिता के मसालों के कारोबार में हाथ बंटाने लगे।

ये कारोबार अब पूरे देश-विदेश में फैल चुका है। 93 साल पुरानी ये कंपनी अब भारत के साथ-साथ यूरोप, जापान, अमेरिका, कनाडा और सऊदी अरब में अपने मसाले बेचती है। कंपनी का कारोबार 1500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का बताया जाता है। उन्होंने अपनी मां के नाम पर दिल्ली में चन्नन देवी स्पेशलिटी हॉस्पिटल भी बनवाया।

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क्यों पड़ा एमडीएच नाम
धर्मपाल की एमडीएच मसाले कंपनी का नाम उनके पिता के काराबोर से जुड़ा है। उनके पिता ‘महशियान दी हट्टी’ के नाम से मसालों का कारोबार करते थे। इसके साथ ही उन्हें ‘देगी मिर्च वाले’ के नाम से भी जानते थे। उन्हें व्यापार और वाणिज्य के लिए साल 2019 में भारत के दूसरे उच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी नवाज़ा गया था।

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