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2500 साल में पहली बार भगवान मंदिर से बाहर हैं लेकिन भक्त नहीं, जानें जगन्नाथ से जुड़ी क्या है कथा

भगवान जगन्नाथ के लिए जगन्नाथ मंदिर में 752 चूल्हों पर खाना बनता है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई का दर्जा हासिल है। रथयात्रा के…

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पुरी में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा। फोटोः ANI Twitter

2500 साल से ज्यादा पुराने रथयात्रा के इतिहास में पहली बार ऐसा मौका होगा, जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकलेगी, लेकिन भक्त घरों में कैद रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की इजाजत के बाद मंगलवार भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा आरंभ हो चुका है। भगवान के रथ खींचने के लिए 500 भक्त ही मौजूद होंगे। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा देवी को गर्भगृह से लाकर रथों में विराजित कर दिया गया है। कुछ ही देर में रथयात्रा शुरू हो जाएगी। कोरोना महामारी के चलते पुरी शहर को टोटल लॉकडाउन करके रथयात्रा को मंदिर के 1172 सेवक गुंडिचा मंदिर तक ले जाएंगे। इससे पहले मंदिर के बाहरी परिसर को सैनिटाइज किया गया।

भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र(बलराम) और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाएंगे। यहां सात दिन रुकने के बाद आठवें दिन फिर मुख्य मंदिर पहुंचेंगे। नौ दिन के उत्सव से पूरा पुरी शहर आनंदित होता है। लेकिन इस बार उत्सव थोड़ा फिका रहेगा। मंदिर समिति पहले ही तय कर चुकी थी कि पूरे उत्सव के दौरान आम लोगों को इन दोनों ही मंदिरों से दूर रखा जाएगा। पुरी में लॉकडाउन हटने के बाद भी धारा 144 लागू रहेगी।

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ज्ञात हो कि भगवान जगन्नाथ के लिए जगन्नाथ मंदिर में 752 चूल्हों पर खाना बनता है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई का दर्जा हासिल है। रथयात्रा के नौ दिन यहां के चूल्हे ठंडे हो जाते हैं। गुंडिचा मंदिर में भी 752 चूल्हों की ही रसोई है जिसे जगन्नाथ की रसोई की ही रिप्लिका मानी जाती है। इस उत्सव के दौरान भगवान के लिए भोग यहीं बनेगा।

भगवान जगन्नाथ के लिए जगन्नाथ मंदिर में 752 चूल्हों पर खाना बनता है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई का दर्जा हासिल है। रथयात्रा के नौ दिन यहां के चूल्हे ठंडे हो जाते हैं। गुंडिचा मंदिर में भी 752 चूल्हों की ही रसोई है, जो जगन्नाथ की रसोई की ही रिप्लिका मानी जाती है। इस उत्सव के दौरान भगवान के लिए भोग यहीं बनेगा।

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जगन्‍नाथ मंदिर की कथा:
माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्‍ण के अवतार जगन्‍नाथजी की रथयात्रा का पुण्‍य सौ यज्ञों के समान होता है। इसकी तैयारी अक्षय तृतीया के द‍िन श्रीकृष्‍ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के न‍िर्माण के साथ शुरू हो जाती है। रथयात्रा के प्रारंभ को लेकर कथा मिलती है कि राजा इंद्रद्यूम अपने पूरे पर‍िवार के साथ नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे।एक बार उन्‍हें समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। तब उन्‍होंने उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय किया। उसी समय उन्‍हें एक वृद्ध बढ़ई भी दिखाई द‍िया जो कोई और नहीं बल्कि स्‍वयं विश्वकर्मा जी थे। बढ़ई बने भगवान व‍िश्‍वकर्मा ने राजा से कहा क‍ि वह मूर्ति तो बना देंगे, लेक‍िन उनकी एक शर्त है। कहा कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊंगा उसमें मूर्ति के पूर्ण रूप से बन जाने तक कोई भी नहीं आएगा। राजा ने इस शर्त को सहर्ष स्‍वीकार कर लिया। कहा जाता है कि वर्तमान में जहां श्रीजगन्नाथजी का मंदिर है, उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारीजनों को बढ़ई की शर्त के बारे में पता नहीं था।

एक रोज रानी ने राजा से कहा क‍ि कृपा करके द्वार खुलवाएं और वृद्ध बढ़ई को जलपान कराएं। रानी के यह बात सुनकर राजा भी अपनी शर्त भूल गए और उन्‍होंने द्वार खोलने का आदेश द‍िया। कहते हैं कि द्वार खुलने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला। लेकिन वहां उन्‍हें अर्द्धनिर्मित श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम की काष्ठ मूर्तियां मिलीं। अधूरी पड़ी प्रतिमाओं को देखकर राजा और रानी काफी दुखी हुए। लेकिन उसी समय दोनों ने आकाशवाणी सुनी, ‘व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं इसलिए मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।’ आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियां पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मंद‍िर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं।

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